राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट भी ज्योतिरादित्य सिंधिया और हिमंत बिस्वा की राह पकड़ेंगे या कांग्रेस के सिपाही बने रहेंगे? इसे लेकर कयासों का दौर जारी है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले पायलट की गतिविधियों ने कांग्रेस की चिंताओं में इजाफा कर दिया है। अब सवाल यह भी है कि आखिर राजस्थान में युवा नेता के बार-बार बदलते रुख की वजह क्या है।
गांधी परिवार से मोहभंग?
दरअसल, अगर पायलट राजस्थान में पार्टी प्रमुख के तौर पर वापसी करते, तो 2023 विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में उनका भी बराबर का योगदान होता। अब कहा जा रहा है कि अनशन के जरिए कांग्रेस नेता यह दिखाना चाह रहे हैं कि पार्टी को लेकर उनकी वफादारी को कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए।
कांग्रेस भी सख्त
इधर, कांग्रेस भी पायलट के अनशन पर सवाल उठा रही है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि इस तरह की गतिविधि को पार्टी विरोधी माना जाएगा। पायलट ने रविवार को कहा था कि वह राज्य की भाजपा सरकार में कथित तौर पर हुए ‘भ्रष्टाचार’ पर कार्रवाई की मांग को लेकर 11 अप्रैल को जयपुर में शहीद स्मारक पर एक दिन का अनशन करेंगे।

